सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

बाकी है..

वो जो मेरे हिस्से का आसमां तुमने चुरा लिया था
उसे कुछ वक्त के लिये वापस चाहता हूं मै
बहुत दिनो से चांद देखने की मेरी ख्वाहिश अधूरी है

कुछ हसरते बाकी रह जाये जीने में
तो मज़ा और ही है
ये क्या कि दीदार-ए-यार के मरीज़ बन गये
कभी वादा करके जो वो ना आये तो
उसका  इंतज़ार तो कुछ
और ही है

उफ़...

बहुत रश्क होता है
हमे उनके झुमके से
कमबख्त घंटे में
हज़ार दफे
उनके गालो को छू जाता है


तुम्हारी आँखो मे बार बार
डूबकर मरना चाहते है
बस यही खता  बार बार
करने को जी चाहता है



इल्ज़ाम

जानते है लाइलाज है पर क्या करे
तुम्हारे सिर पर ये इल्ज़ाम भी तो अच्छा नही लगता
इसीलिये दवा के बहाने ही सही
दर्द को हम घूंट घूंट पिये जा रहे है

मुलाकात से पहले ही मालुम था
ये इल्ज़ाम लगने वाला है
इसीलिये यारो ये  गुनाह हम
खुद-ब-खुद कर बैठे

बेमौसम

क़ीमत का सही अंदाज़ा लगाना हो तो
कभी बेमौसम होकर देखना
सर्दी मे आम बहुत महँगे
बिका करते है

बहार जब हर दम रहे तो
बेदम हो जाती है
ये मौसमों का सिलसिला
किसी ने यूँ ही नही बनाया है

बेइरादा

वो तो बस बेइरादा निकले थे घर से
ना जाने क्यों कई क़त्लों का इल्ज़ाम उनके सिर आ गया

ना जाने कितनों को बेमौत मार डाला
आज वो बेमौके छत पे जो आ गये

कुछ इस क़दर मैंने चाहा है उनको

मानो कोई पुराना क़र्ज़ चुकाने की कोशिश की है
हिसाब बराबर करने का इरादा नही है मेरा
ये क़र्ज़ तो बार बार उतारने की हसरत लिये
ज़िन्दा हूँ मै

कभी तो याद कर

कुछ शामें उधार है इस शहर की
वो चुकाने आया हूं
मै तेरे शहर में
इसी बहाने आया हूं 

मैं ना होता मैं
उनका आइना ही हो जाता
संवरने के बहाने ही सही
उन्हे मेरी याद तो आती

तेरा ख्याल

वो तेरा ख्याल ही है जो खूबसूरती ले आता है
वरना बाज़ारो मे लाली तो कब से बिका करती है

ये कमबख़्त अल्फाज़ अक्सर बिगाड़ देते है
खूबसूरती जज़्बात की
कलम को दिल से यूं मुकाबिल ना कर

कलम से एहसासो को यूं बयां ना कर
ये शौक तो आँखो के हिस्से आने दे

उफ ये बेचैनी

ये बेचैनी हमे जीने नही देगी और बेचैनी चली गई तो शायद हम ही ना जी पाये तेरे इश्क मे सुकून कभी मिला ही नही बे-आरामी मे रहने की ये आदत ...